STAR NEWS के स्टेट एडिटर विजय कुमार की खास रिपोर्ट
रांची । समय का चक्र हमेशा घुमता रहता है। कालचक्र इसे ही कहते हैं। कलिंग युद्ध के समय सम्राट अशोक की सेना मगध से छोटानागपुर-संथाल परगना के रास्ते ही युद्ध स्थल पर पहुंची थी। इतिहास साक्षी है कि इस युद्ध में कोई डेढ़ लाख से अभी अधिक सैनिक मृत्यु को प्राप्त किये थे । इतिहास इस बाद का भी साक्षी है कि इस युद्ध के बाद मगध के सम्राट चक्रवर्ती अशोक युद्ध में हुए भीषण रक्तपात को देख बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया था। आज भी बोध गया के खंभों पर इस बात का उल्लेख है। उसी छोटानागपुर की भूमि कोयला नगरी धनबाद में आज चर्चा आम हैं कि सत्ता और अधिपत्य के लिए दशकों पहले जिन-जिन लोगों ने खूनी संघर्ष किये थे, वे मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं। रक्तरंजित की परंपरा को विराम देने की बजाय कोयलांचल की धरती पर हर दबंग घराना एकछत्र राज कायम करना चाहता है। एक दूसरे के खून के प्यासे घराने प्रतिशोध की आग में दिन रात जल रहे हैं। कब किसका जिंदगी का विकेट गिरेगा, यह मौत का फिल्डिंग सजाने वाले भी नहीं जानते हैं। कभी कभी फिल्डिंग सजाने वाले भी खुद जिंदगी की मैदान से आउट हो जाते हैं।
अविभाजित बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के समय से ही अपराधियों का राजनीतिकरण शुरू हो गया
कर्पूरी ठाकुर 1970 से 1979 के बीच दो बार मुख्यमंत्री बने. यह एक ऐसा दौर था जब बिहार ही नहीं, बल्कि देश में राजनीतिक परिस्थियां बदल रही थी. अपराधियों का राजनीतिकरण भी आरम्भ हो चुका था। तत्कालीन अविभाजित बिहार के अपराधी, जो सत्ता की गलियारों में कमर कसने लगे थे, उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि राजनीति उनके बिना नहीं चल सकती है और राजनेता भी उनके सहयोग के बिना, खासकर आर्थिक सहयोग, के बिना ‘राजनीति में डकार’ भी नहीं ले सकते हैं । यह सोच ‘पैसे’ के कारण हो गयी थी, जिसे तत्कालीन स्वार्थी राजनेताओं ने इसे तूल भी दिया और आसानी से भुनाया भी। इसका सीधा प्रभाव उस दिन पटना सचिवालय में दिखा जब दक्षिण बिहार के ‘दर्जनों कोयला माफिया’ मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए एक साथ कमर कस कर तैयार हो गए थे। पटना की सड़कों के किनारे बड़े बड़े होटलों और डाक बंगलों में अपना-अपना ठिकाना बनाकर सरकार गिराने को सज्ज थे। वजह था कर्पूरी ठाकुर कोयला माफिया और उन माफियाओं के साथ हाथ मिलाने वाले सभी लोगों की ‘तथाकथित ताकत को चुनौती दिए थे।” यानी कर्पूरी ठाकुर और कोयला माफिआओं के साथ आर पार की प्रशासनिक लड़ाई छिड़ गयी थी।
1988 में लुबी सर्कुलर रोड के कोलियरी मज़दूर संघ कार्यालय में हुई थी गोलियों की बारिश
एक फ़रवरी 1988 को शहर के लुबी सर्कुलर रोड स्थित राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ के कार्यालय में दिन के 11 बजे बैठक हो रही थी और माइक पर तत्कालीन कोयला क्षेत्र के नेता एसके राय माइक पर भाषण दे रहे थे. देखते ही देखते बाहर कई गाड़ियां आकर रुकी. जिससे कई अंजान चेहरे हाथों में हथियार लेकर उतरे. मौजूद लोग कुछ समझ पाते. देखते ही देखते गोलियों की बारिश होने लगी. सभी एसके राय को मारने आये थे. कुछ लोगों ने कवर किया तो वे ढेर हो गए. समय उन्हें अपना कवच दे दिया। वे तो बच गए, लेकिन उमाकांत सिंह समेत चार लोग वहीँ ढ़ेर हो गए. राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ के नेता एसके राय के साथ साथ धनबाद के पूर्व विधायक एसपी राय भी नहीं रहे। अभियंता सह श्रमिक नेता एके राय भी अंतिम सांस ले चुके हैं। धनबाद के ‘सिंह’ नेताओं में सूर्यदेव सिंह भी नहीं है। इसके अलावा नवरंगदेव सिंह और सकलदेव सिंह भी मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैँ। बिनोद सिंह, रघुनाथ सिंह के साथ साथ बच्चा सिंह भी नहीं रहे.
1950 में बीपी सिन्हा ने तैयार की थी कोयले की अवैध कमाई की पृष्ठभूमि
धनबाद की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी इस बात की गवाही आज भी देती है कि कोयले की अवैध कमाई की पृष्ठभूमि 1950 में बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा यानी बीपी सिन्हा ने तैयार की थी। उन दिनों सम्पूर्ण कोयलांचल में सिन्हा साहब का एकछत्र राज था। वे बरौनी के रहनेवाले थे और राजनीति में उनकी विशेष पकड़ थी। वे सर्वप्रथम 1950 में धनबाद पदार्पित हुए। उनमें बहुत बातें ईश्वरीय थी। लिखना, बोलना जैसा सरस्वती की देन थी। उनका वही आकर्षण तत्कालीन कोलियरी मालिकों को आकर्षित किया। वे इंटक से जुड़े और ताकतवर मजबूत नेता के रूप में उदय हुए।
बीपी सिन्हा के घर के दरबान थे धनबाद के माफिया सूर्यदेव सिंह
बीपी सिन्हा कोयलांचल में युवा पहलवानों की फौज बनाई, जिसमें सूर्यदेव सिंह इनके सबसे विश्वासपात्र थे। लोगों का कहना है कि धनबाद के माफिया सूर्यदेव सिंह कभी बीपी सिन्हा के घर के दरबान थे सिन्हा का इतना दबदबा था कि उन्हीं की मर्जी से कोयला खदान चलती थी। सिन्हा का आवास जोड़ा फाटक रोड में व्हाईट हाउस के रूप में मशहूर हुआ करता था और पूरे इलाके में माफिया स्टाइल में उनकी तूती बोलती थी। लाठी हमारी तो मिल्कियत भी हमारी ” चरितार्थ हो रही थी। घटनाओं की गूंज बिहार और दिल्ली की सत्ता के गलियारों से लेकर पार्लियामेंट तक सुनाई पड़ रही थी। ए+बी+सी=डी काफी प्रचलित हो चुका था. उन दिनों यानी ए-आरा + बी-बलिया + सी-छपरा =डी धनबाद का नारा बुलंद हो चुका था। कोल माइनिंग पर वर्चस्व के लिए मजदूर संघ का मजबूत होना बहुत ही आवश्यक था. बीपी सिन्हा इस बात को बखूबी जानते थे। जब 17 अक्टूबर 1971 को कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता है. राष्ट्रीयकरण होते ही बीपी सिन्हा का कोल नगरी पर पकड़ और अधिक मजबूत हो जाता है. पूरे कोल माइनिंग में उनकी तूती बोलने लगती है. उनका कोयले की खदानों पर एकछत्र राज चलने लगता है। कहा जाता है कि मजदूरों को काबू में रखने के लिए उन्होंने पांच लठैतों की एक टीम बनाये थे।
बीपी सिन्हा की हत्या के बाद शफी खान और सूर्यदेव सिंह के बीच शुरू हो गई दुश्मनी
बीपी सिन्हा की हत्या के बाद ही झरिया के सूर्यदेव सिंह और वासेपुर के शफी खान के बीच दुश्मनी शुरू हो गई. बीपी सिन्हा की हत्या में सूर्यदेव सिंह का नाम आया था, लेकिन कुछ समय बाद वे इस कांड से बरी हो गए। बीपी सिन्हा कांग्रेस के प्रचारक थे और कोल माइनिंग में भारतीय राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ की तूती बोलती थी। उनका माफिया राज इतना बड़ा था की एक बार जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने रैली के दौरान सभा में देर से आई थीं, इस बात को लेकर बीपी सिन्हा बहुत नाराज हुए थे, जिसको लेकर इंदिरा गाँधी को भरी सभा में जनता से क्षमा माँगनी पड़ी थी। उनकी प्रभुता के किस्से में एक अध्याय यह भी जुड़ा है की उन्होंने अपने माली बिंदेश्वरी दुबे’ को मजदूर संघ का नेता तक बना डाला था। वे कांग्रेसी थे और उनका कद इतना बड़ा था की उन दिनों भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी वार्तालाप हॉटलाइन पर हुआ करती थी। समय का चक्र यहाँ भी चल रहा था। केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई इंदिरा गांधी के विरोधी लहर के दौरान विरोधी बीपी सिन्हा के इस वर्चस्व को तोड़ने के लिए मौके की तलाश में थे.
डाकू के भेष में आये और बीपी सिन्हा को मशीन गन से भून डाला
28 मार्च 1979 की रात धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में बीपी सिन्हा अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब हां में मिलने पर वे लोग लौट गये। इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी। सिन्हा साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ लेकर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं.सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं, मोटा सा लंबे कद का एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा । करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां भेद चुकी थी। वे खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी।धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर कलकत्ता तक, धनबाद से लेकर पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया। सिन्हा साहेब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक और बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले बीपी सिन्हा की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया।
बीपी सिन्हा का ‘अंत’, ही सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ हुआ
बीपी सिन्हा का ‘अंत’, ही सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया। व्हाइट हाउस का नामोनिशान समाप्त हो गया है। कतरास मोड़ की मिट्टी कहती है कि 1967 में रामदेव सिंह, फिर 1967 में ही चमारी पासी, 1977 में श्रीराम सिंह की हत्या हुई। 1979 में बीपी सिन्हा को गोली मारी गयी। पांच साल बाद 1983 में शफी खान, फिर 1984 में असगर, 1985 में लालबाबू सिंह, 1986 में मिथिलेश सिंह, 1987 में जयंत सरकार की हत्या हुई। हत्या का सिलसिला अभी रुका नहीं था। इसके बाद 1986 में अंजार, 1986 में शमीम खान, 1988 में उमाकांत सिंह, 1989 में मो सुल्तान की हत्या हुई। उसी वर्ष 1989 में ही राजू यादव को मौत के घाट उतारा गया। 15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी।
1999 से 2026 तक दर्जनों हत्याएं हुई
25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद शहर के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। फिर 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर और 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। 2000 में रवि भगत, 2001 जफर अली और नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी की हत्या हुई। उसी वर्ष 2002 में ही सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या हुई। उसके बाद 2003 में प्रमोद सिंह, फिर 2003 में राजीव रंजन सिंह, 2006 में गजेंद्र सिंह, 2009 में वाहिद आलम, 2011 में इरफान खान, सुरेश सिंह, 2012 में इरशाद आलम उर्फ सोनू और 2014 में टुन्ना खान तथा 2017 में रंजय सिंह की हत्या हुई। फिर एक के बाद एक अब तक दर्जनों हत्याएँ हो चुकी है. रामधीर झरिया के पूर्व विधायक स्वर्गीय सूर्यदेव सिंह के पांच भाइयों में सबसे छोटे है। रामधीर सिंह को ‘सिंह मेन्शन’ के रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है।
1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने थे
सूर्यदेव सिंह के द्वारा स्थापित जनता मजदूर संघ के रामधीर अध्यक्ष भी रह चुके है। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। विनोद सिंह हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने 2015 में रामधीर सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। रामधीर सिंह के बेटे शशि सिंह पर कोयला कारोबारी व कांग्रेस नेता सुरेश सिंह की हत्या का भी आरोप है। सुरेश सिंह की हत्या 7 दिसंबर 2011 को हुई थी। इस हत्या के बाद शशि सिंह धनबाद से फरार हो गए। धनबाद पुलिस अभी भी शशि सिंह को ढूंढ रही है। सुरेश सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव भी लड़ चुके थे। नीरज सिंह 2019 के लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले थे, लेकिन नीरज सिंह की हत्या करा दी गई। सिंह मेंशन में रहने वाले पांच भाइयों में चार का कुनबा आज बिखर गया है। सूर्यदेव सिंह पांच भाई थे। विक्रमा सिंह अपने पैतृक गाँव बलिया में ही रह गये। जबकि राजन सिंह, बच्चा सिंह और रामधीर सिंह सूर्यदेव सिंह के साथ रहे। बाद में बच्चा सिंह ने सूर्योदय बना लिया तो राजन सिंह के परिवार ने रघुकुल। अब बच्चा सिंह भी नही रहे. नवम्बर 1990 में जब चंद्रशेखर सिंह प्रधानमंत्री बने थे, तब वह सूर्यदेव सिंह से मिलने धनबाद आये थे। 15 जून 1991 में हार्ट अटैक से उनकी मौत के बाद परिवार के बीच ही विवाद हो गया और सभी भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। 1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने थे.

