जुर्म की दुनिया में तैर रही है पुलिस और गोदी मीडिया की जिंदगी

 


जुर्म की दुनिया में तैर रही है पुलिस और गोदी मीडिया की जिंदगी 

 क्राइम रिपोर्टर राजकुमार सिंह की खास रिपोर्ट 

रांची : दिल्ली, मुंबई, रांची, पटना हो या फिर धनबाद. लगभग सभी जगह जुर्म की दुनिया में पुलिस और गोदी मीडिया की जिंदगी तैर रही है. भौतिक सुख सुविधाओं के लिए अंडरवर्ल्ड डॉन, गैंगस्टर और तस्करों से हाथ मिलाकर पुलिस और गोदी मीडिया ने समाज को नर्क में झोंक दिया है. दोनों ने मिलकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को नाश कर दिया है. समाज के बुद्धिजीवियों के अनुसार पुलिस और गोदी मीडिया समाज ही नहीं बल्कि पूरे देश के सबसे बड़े दुश्मन है. किसी गरीब या आम आदमी के साथ आपराधिक घटना हो जाए तो पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती है. वहीं दूसरी ओर किसी अमीर या सत्ताधारी पार्टी के लोगों के साथ छोटी-मोटी घटना हो जाती है तो पुलिस एक फोन पर काफी संख्या में पलक झपकते ही घटनास्थल पर पहुंच जाती है. टैक्स पूरा देश देता है और कानूनी कार्रवाई अमीर और सत्ताधारियों के लिए पुलिस करती है. इतना ही नहीं, जिस गैंगस्टर और तस्करों से पुलिस हर महीने वसूली करती है. अगर उसके साथ भी कोई घटना या गैंगवार हो जाए, तो थानेदार से लेकर डीएसपी, एसपी तक काफी संख्या में पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच जाते हैं.

लोग कुत्ते पालते हैं और पुलिस अपने फायदे के लिए तस्करों और अपराधियों को पालती है 

 लोग अपनी जानमाल की रक्षा के लिए कुत्ता पालते हैं, जबकि पुलिस तस्कर, चोर, लुटेरे, डकैत, रंगदार,  गैंगेस्टर, अंडरवर्ल्ड डॉन, माफिया को पालती है. मौत का कारोबार करनेवाले जब पुलिस और सत्ताधारियों के लिए असहनीय सिर दर्द या पाइल्स बन जाता है तो गुंडों का तलवा चाटने वाले और अपराधियों के पीछे दुम हिलाने वाले पुलिस अधिकारी और नेता कहेंगे कि समाज के लोग हमारी मदद नहीं कर रहे हैं, वरना क्राइम को रोकना तो उनके लिए बाएं हाथ का खेल है. कभी-कभी माफिया, गैंगस्टर और कुख्यात तस्करों के साथी गैंगवार के समय रास्ते का रोड़ा बनने पर झुंड बनाकर पुलिस टीम पर ही हमला कर देते हैं. धनबाद के कोलियरी क्षेत्र में कई बार इस तरह की घटनाएं घट चुकी है. फिर भी नेता और पुलिस जुर्म की दुनिया में राज करने वाले मौत के सौदागरों को नेस्तनाबूत करने की बजाय गोदी मीडियाकर्मी वसूलीबाज अजय प्रसाद की तरह लात जूता खाने के बाद भी अपराधियों का तलवा चाटने में ही खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं. 



 गोदी मीडिया है तो पुलिस के लिए हर चीज मुमकिन है 

लोग कहते हैं कि जब क्राइम क्षमता से हजार गुना अधिक बढ़ जाता है तो पुलिस अधिकारी गोदी मीडिया के माध्यम से समाज को दिखाने के लिए कुछ लोगों को हथियार, जेवरात आदि के साथ पकड़ लेती है या फिर कहीं से जुगाड़ कर टेबल पर रखकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देती है. उसके बाद खुद अपनी पीठ थपथपाने के लिए  एक से दो दर्जन आपराधिक कांडों का खुलासा कर देती है. बहुत ही बेशर्मी के साथ कह देते हैं कि इन्हीं लोगों की वजह से शहर से लेकर गांव तक क्राइम बढ़ गया था. अब लोग भयमुक्त होकर समाज में रहेंगे.   देश की कोयला राजधानी धनबाद के लगभग सभी 58 थाना क्षेत्र का यही हाल है. भू-धंसान, चाल धंसान और सड़क हादसे में हर साल सिर्फ धनबाद में 1000 से अधिक पुरुष महिलाएं और बच्चों की मौत होती है. जबकि बेशर्म पुलिस और नेता  कहते हैं कि लोगों की लापरवाही से ही इस तरह के हादसे होते हैं. लोगों का कहना है कि जीटी रोड से अधिक रफ्तार में बाइकें और कार शहर की सड़कों और मुहल्ले में चलती है. इसके अलावा ऑटो और टोटो की रफ्तार भी वही है. लहरिया स्टाइल में आंधी तूफान की तरह बाइकें चलती है. बाइक और कार सवार के साथ साथ राहगीर भी अक्सर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं या यमराज के दरबार पहुंच जाते हैं. पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ कभी भी सख़्ती से न तो कार्रवाई करती है और ना ही लगातार एक महीने तक अभियान चलाती है. पुलिस सिर्फ बगैर हेलमेट के वाहन चालक को पकड़ती है और वसूली में लग जाती है 

 जनता की समस्या की बजाय सरकारी एजेंडे को बढ़ावा देते हैं गोदी मीडिया

गोदी मीडिया' शब्द का प्रयोग मुख्यधारा के उन मीडिया घरानों की आलोचना के लिए किया जाता है जो सरकार के समर्थक माने जाते हैं और कथित तौर पर सरकार के एजेंडे को बढ़ावा देते हैं, स्वतंत्र पत्रकारिता के बजाय कॉरपोरेट और सत्ता-केंद्रित खबरों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यह शब्द 'लैपडॉग जर्नलिज्म' से प्रेरित है, जिसमें मीडिया सत्ता के साथ मिलकर काम करता है। गोदी मीडिया को जनता की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं रह गया है. सरकार की नीतियों, फैसलों और प्रचार को प्रमुखता से दिखाते हैं. अक्सर समाज के धनी और शक्तिशाली वर्ग या सरकार का समर्थन करता है, न कि आम जनता के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है. इस मीडिया की विशेषता है कि यह स्वतंत्र शक्ति की कमी दिखाता है और सूचना या आर्थिक सहायता के लिए सरकार और कॉरपोरेट पर निर्भर रहता है. गोदी मीडिया सरकार से सवाल करने के बजाय अक्सर विपक्ष या सरकार के आलोचकों पर निशाना साधता है।

ऐसे हुआ वैकल्पिक मीडिया का उदय

गोदी मीडिया के प्रभुत्व के कारण, लोग अब स्वतंत्र यूट्यूबर्स, वेब पोर्टल्स और ऑनलाइन रिपोर्टिंग जैसे वैकल्पिक मीडिया की ओर मुड़ रहे हैं। गोदी मीडिया (Godi Media) एक व्यंग्यात्मक शब्द है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से भारतीय पत्रकार रवीश कुमार द्वारा भारत सरकार और सत्तारूढ़ दल (भाजपा) के प्रति अत्यधिक पक्षपाती, चाटुकारितापूर्ण और सरकार की नाकामियों को छिपाने वाले प्रिंट/टीवी मीडिया के लिए किया जाता है। यह शब्द 'गोद' से बना है, जिसका अर्थ है सरकार की 'गोद में बैठे' मीडियाकर्मी। गोदी मीडिया सरकार से सवाल पूछने के बजाय उनका गुणगान करता है। सत्ता के बजाय विपक्षी दलों के नेताओं से तीखे सवाल पूछे जाते हैं। ध्रुवीकरण करने वाले मुद्दों को प्रमुखता दी जाती है, जबकि जनसमस्याएं पीछे छूट जाती हैं। गोदी मीडिया" एक अभिव्यक्ति है जो उन मीडिया संस्थानों को वर्णित करता है जो संचार के क्षेत्र में बहुत ज्यादा अधिकार और उत्साह रखते हैं। ये मीडिया संस्थान अक्सर राजनीतिक अफवाहों और झूठी खबरों को फैलाते हैं और एक विशेष राजनैतिक दल या व्यक्ति की पक्षपातपूर्ण बैठकों का प्रसार करते हैं।


 गोदी मीडिया का उद्देश्य लोगों को भ्रमित करना है 

गोदी मीडिया का उद्देश्य लोगों को भ्रमित करना होता है ताकि वे असली तथ्यों से अलग हो जाएं और उनकी राय उनके विरोधियों की राय के आधार पर तय हो जाए। इस प्रकार की मीडिया का असर सामाजिक और राजनीतिक विभाजन को बढ़ाता है और असली समस्याओं का समाधान नहीं करता है। गोदी मीडिया के बारे में उल्लेखनीय बात है कि इसका उपयोग किसी विशेष दल या व्यक्ति के अभिप्रायों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है और इससे देश की जनता वास्तविक तथ्यों से वंचित होती है। गोदी मीडिया देश की भलाई के बारे में नही सोचेगा. आपके हित में तो भूल से नहीं सोचेंगे ! इनको मुद्दा चाहिए, जनता को मूर्ख बनाने के लिए ! यक़ीन मानिए अगर आप एक साल तक news चैनल और अखबार नहीं देखते तो आपका उम्र 5 साल बढ़ सकता है ! ये लोग हमेशा हमारे दिमाग़ में बुरी चीज डालते हैं, सच्चाई से दूर केवल आपको डराते हैं. जिससे लोग मानसिक रोगी बनके रह जाते हैं ! आपने सुना होगा फला दंपत्ति ने किसी बच्चे को गोद ले लिया है यानी उसके देखरेख की पालन करने की जिम्मेदारी उसकी। ठीक उसी तरह जो मीडिया को गोद ले ले उसके खान-पान , नोट पानी और दिशानिर्देश में चले पाले पोसे उसे गोदी मीडिया कहते हैं।

 "ना खाता ना बही जो गोदी मीडिया कहे वही सही"

सामान्य अर्थों में गोदी मीडिया के बारे में कहा जाए तो चौथा स्तंभ के कर्तव्य का पालन न करते हुए "ना खाता ना बही जो गोदी मीडिया कहे वही सही" के तर्ज पर जी हुजूरी,तलवा चाट में मस्त, हां में हां मिलाने वाले गोदी मीडिया के दलाल फर्जी पत्रकार और मीडिया हाउस है। जो सरकार के कदम रखने से पहले उनके कदमों के नीचे धूल है या फूल है की बातें बताने लगते हैं। चौथे स्तंभ का कार्य सवाल करना होता है, परिक्रमा करना चाटुकारिता करना बिल्कुल नहीं। हालांकि कुछ अन्य मीडिया हाउस हैं जो चौथे स्तंभ की साख को बचाए हुए हैं। गोदी मीडिया सरकार के पक्ष में अखबारों और पत्रिकाओं में बड़े बड़े लेख और संपादकीय लिखते हैं। सरकार की जायज़ नाजायज नीतियों को हाइलाइट करते हैं। जब सरकार बदल जाती है तो ये उसके हर काम का घनघोर विरोध करते हैं। दूसरे वर्ग में ऐसे पत्रकार शामिल हैं जो सरकार के बुरे कामों की आलोचना करते हैं और सही कामों का समर्थन भी करते हैं। ये किसी राजनीतिक दल के साथ बंधे हुए नहीं होते। तीसरे वर्ग में ऐसे पत्रकार शामिल हैं जो सरकार की खिंचाई करने में विश्वास करते हैं। उन्हें किसी भी काम में कुछ भी अच्छाई नजर नहीं आती। "गोदी मीडिया" शब्द की उत्पत्ति 2012 में हुई थी, जब तत्कालीन एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने एक टॉक शो के दौरान इसका इस्तेमाल किया था। तब से, यह शब्द सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में आम हो गया है। गोदी मीडिया की विशेषता है कि यह सरकार के प्रति अत्यधिक अनुकूल और समर्पित होता है, और अक्सर सरकार की नीतियों और कार्यों की आलोचना करने से बचता है। इसके अलावा, गोदी मीडिया अक्सर विपक्षी दलों और सरकार के आलोचकों के प्रति नकारात्मक और आलोचनात्मक होता है। गोदी मीडिया का उदय 2014 के बाद से हुआ है, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने केंद्र में सरकार बनाई थी। तब से, कई मीडिया संस्थानों ने सरकार के समर्थन में काम करना शुरू कर दिया और सरकारी नीतियों की आलोचना से बचने की कोशिश की है।

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